हिन्दू धर्म सनातन है तथा इसके अनुसार मनुष्य के लिए गर्भधारण से लेकर अंत्येष्टि तक 16 संस्कार हैं जिसमे कि, विवाह एक अत्यधिक महत्वपूर्ण मुख्य 13वा ( तेरहवां ) संस्कार है। हम यदि इस बात की और गौर करें तो पता चलता है कि ,समूचे भारतवर्ष मे विवाह पद्धति और रस्में निभाते हुए कुछ रस्में इस प्रकार की होती है जिसे देख कर या सुन कर उपस्थित जनमानस आनंदित हो उठता है। हिमाचल प्रदेश के सभी इलाकों में आपको ऐसा कुछ देखने को मिलेगा जो आपको हंसने या चौंकाने पर मजबूर कर देगा और यह प्रथाएं हर 20 किलोमीटर के अंतराल पर बदलती रहती है। बातें बहुत सी हैं किन्तु लम्बे लेखों को शायद पढ़ा नहीं जाता इसलिए 10 % आज और 90 % इसी संदर्भ में कभी दूजी बार।
सीठणियां ….. गालियां तथा तरमाउल।
हमारे पहाड़ों में यह मान्यता है कि श्री राम सहित तीनो राजकुमार जब विवाह के पश्चात समस्त जनैत ( बारातियों ) सहित भोजन के लिए बैठे तब वहां की महिलाओं ने मजाक में गालियां और सीठणियां तथा बंधन दे कर सभी के भोजन चावल इत्यादि का बंधन कर दिया था। उसी समय किसी ऋषि ने उस भोजन को बंधन मुक्त तरमाउल पढ़ कर किया था। सीठणियां , गालियां तथा बंधन ( बाननु) लगभग एक ही जैसे हैं और अधिकतर अनिबद्ध गायन के रूप मे गाये जाते है अर्थात ताल रहित होते हैं ,किन्तु कुछ एक क्षेत्रों में महिलायें ढोलक पर भी ठेका लगा कर इन्हे गाती हैं। कभी – कभी तो यह सब लय में भी नहीं होता।
1 ) सोलन – शिमला जनपद मे प्रचलित
म्हारे पाईये रे मुहें लॉन्ग सुपारी जनैतिया रे मुहेँ महिन्शी रा आड़।
(वधु पक्ष वाली स्त्रियां कह रही है की हमारे भाई और हमारे लोगों के लिए सुपारी , लॉन्ग इत्यादि खाने को है किन्तु वर पक्ष और बारातियों को भैंस की हड्डियां मुबारक हो। )
2 ) कांगड़ा , मंडी , ऊना क्षेत्र में प्रचलित
2.1. मिरचा झरभरिया चनेया दी दाल करारी
लाड़ा खाणा बैठया खाइगेया बाटी सारी
खाई कने होर मंगदा लबड़ा च कड़छी मारी।
2.2. डबल रोटी जलंधर दी ,
लाड़े दे लजोडुआ सकल तेरी बांदर दी।
डबल रोटी कुलु दी ,
लाड़े दे लजोडुआ सकल तेरी उल्लू दी।
2.3. लाड़ा पुखा आया में खिचड़ी बनावां ,
अट्टा नई घराटे जा , शाकर नी मटाके ला ,
घियवे रा होंदा पुखा मैं खिचड़ी बनावां ,
लाड़ा पुखा आया में खिचड़ी बनावां।
3 ) बिलासपुर और कहलूर , शिमला में प्रचलित
3.1. जनैति बइठे खाण मुइये बूबा चढ़ रईया कुगलिया।
हाइडे करदा ,सामा करदा परे पड़दा ,बाकरेया मान्दा चार मुइये ,
उतरेया इना रिये पुर्बलिये पण्णमेसरिये।
(बाराती जब खाना खाने के लिए बैठते हैं तब वधु पक्ष की महिलायें तथा पुरुष भी इस सीठणी का इस्तेमाल करते हैं। इस सीठणी में कभी -२ दोनों पक्षों में अन-बन भी हो जाती है। वधु पक्ष की तरफ से यह कहा जाता हैकि बारातियों के गोद में इनकी दादिया या बुआ इत्यादि बैठी है और हम उनके पैर पकड़ते हैंकि वह इनकी गोद से उतर जाये और इन्हें भोजन करने दे भले ही वो (वधु पक्ष) इसके लिए बकरा तक देने को तैयार है और वैसे भी आप इनके लिए परमेश्वर समान ही हो।)
3.2. बाड़ी हेट बरोटा … क्या बोलियीईए
दाल बी खाई लई भात बी खाई लेया सारा खाई लेया झोटा …. क्या बोलियीईए।
पारलिया बिया डिब्ड्डी क्या बोलियीईए
दाल बी खाई लई भात बी खाई लेया साड़ी खाई लेई गिदड़ी ….क्या बोलियीईए।
डी. जे . ऑर्केस्टा की रंगत से बेहद दूर ,पहाड़ी धुनों पर यह सीठणियां सुन कर बेहद आनंद आता था किन्तु कई बार अधिक हल्ला हो जाने पर बड़े- बुजुर्गों को इसे बीच मे आ कर बंद करवाना पड़ता था। लेकिन कहते हैं कि शादी से पहले छोटा सा ये जो विघ्न ( व्यंग्यताम् ) होता था इससे वर – वधु के आने वाले समय को सुखद बनाने के लिए निभाया जाता था। यहां सिर्फ 2 -4 सीठनियों को बताया है बंधन ( बाननु ) अभी इस कड़ी से अछूता है और बंधा हुआ खाना खाने को अति हास्यप्रद माना जाता था जिसे तरमाऊल द्वारा खोला जाता था।

इन दोनों के बारे में जानकारी अगले अंक में। तब तक के लिए इनका लुफ्त उठाये । …..